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Saturday, July 14, 2012

ख़ामोशी

 ख़ामोशी...

बेजुबां   होकर भी कितना  कुछ  कह जाती है... 

अनेकों रंग  हैं इसके भी ,

कभी नाराजगी  जता  जाती है ये,

तो कभी दिल में  मच  रही  हलचल  का  द्योतक है ..

कभी दिल के चैन का  जरुरत ये बनती है ,

तो कभी  बेचैनी और और  बेताबी  का  सबब ये है .

तूफान के आने से पहले भी ये है ,

तूफां के चले जाने के बाद भी ये ही है .

ध्यान में  भी ये है ,

तो शमशान में भी ये ही है .

यूँ  तो है ये ,

एकदम शांत, शुन्य और  मौन .

पर खास-ए -ख़ामोशी तो देखिये,

ये  सन्नाटा और मौन ही काफी है,

राज़-ए-ख़ामोशी बयां  करने को.


ये  ख़ामोशी ......

8 comments:

  1. ख़ामोशी वार्तालाप की महान कला है ,तभी तो कहते हैं....
    सुन्दरता से पिरोया आपने ख़ामोशी को....

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति!
    इस प्रविष्टी की चर्चा कल रविवार (15-07-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
    सूचनार्थ!

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    Replies
    1. धन्यवाद शास्त्री जी

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  3. बहुत ही खामोश है ये खामोशी !
    सुंदर भाव !

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  4. आपकी इस कविता के नाम से ही मेरा एक ब्लॉग भी है... कविता अच्छी लगी...

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