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Thursday, August 2, 2012

ये तन्हाई ....

ये तन्हाई ....

अकेले देख के मुझको ,

चली आती है सताने..

सांथ में लेके  यादो को ,

दुःख  में सांथ देने चली आती है ...

ये तन्हाई ...

रंग, ख़ुशी, खुशबु,

सबके मायने बदल देती है..

वक्त से ये बेखबर,

वक्त बेवक्त आकर,

मुझे मेरे होने का एहसास करा देती है..

मनो कह रही हो मुझसे,

पगले तू क्यों दीवाना है...

दुनिया से इक दिन सबको तनहा करके,

तुझको तनहा ही तो जाना है ..

ये तन्हाई ........

6 comments:

  1. बहुत बढ़िया प्रस्तुति!
    श्रावणीपर्व और रक्षाबन्धन की हार्दिक शुभकामनाएं!

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    1. धन्यवाद शास्त्री जी ..आपको भी हार्दिक शुभकामनाएं

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  2. बहुत खूब अंशु भाई...
    अच्छी लगी कविता...

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    1. धन्यवाद सतीश जी

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