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Monday, December 23, 2013

पूछता हूँ दिल से

अब भी पूछता हूँ  दिल से,
कब थमेगा ये सिलसिला।

यूँ  कब तलक तड़पायेगा,

सोचता है ये,

चाहता है ये,

चाहतो के फेर में गिरता संभलता,

टूटता है ये। 

गिरता है पड़ता है  पर थमता नहीं।

मचलता है तड़पता है पर थमता नहीं। 

कमजोर करता है मुझे तोड़ के रख देता है.. 

पर थमता नहीं।।

आंखिर कब तलक यूँ ही धड़कता रहेगा 

अब भी पूछता हूँ  दिल से,

कब थमेगा ये सिलसिला।

Wednesday, August 28, 2013

Hunting the treasure

Hunting the treasure of


your remembrance,


sunk deep inside me...


eyes are moist,lips are shivering..


in my loneliness i am always thinking,


you are still the same inside me n my feeling..


now this is my loneliness which i am loving,after you...


cause in my loneliness i am always thinking,of you...

Hunting the treasure...


Thursday, August 8, 2013

चाहत 2

वो चाहत थी मेरी ,

मेरी इबादत थी।

मगर उसको तो तारों के बीच में रहने की आदत थी।

ये शरारत थी उसकी,

या उसकी फितरत थी।

होगा उसके दिल में मेरे लिए प्यार,


मगर तारों की भी हसरत थी।

ये जो तारों के लिए थी चाहत,

वो मुझे न थी गवारा,

जब मेरा ही बन गया था तो,

उसपे हक था सिर्फ मेरा।।

जला देते खुद को आंखिर उसकी खातिर,

हम भी बन जाते सितारा।

लाख किये जतन,लाख समझाया,

न माना वो।

तब समझ आया उसे ,

जब  वो ही न रहा मेरा।

आज फिर वो चाँद फलक पे है,

पर आज फांसले हैं दरम्यान।

आज फिर हम अकेले हैं,

और उसका है सारा जहाँ।।




Wednesday, July 24, 2013

चाहत...

देखा जब चाँद को फलक पे ,

तो उसको पाने की चाहत सी जाग गयी।

अक्सर मुलाकात होती थी उससे रातों को,

इस तरह हमारी रातों की नींद भाग गयी।

किसी ने पागल कहा किसी ने कहा दीवाना,

आंखिर हो ही गयी थी मुहाब्बत हमने भी माना।

चाहने से ही हांसिल नहीं होता कुछ ,

तब हमने भी जाना।

जब देखा कि उस चाँद का तो था हर कोई दीवाना,

पर दिल तो दिल है,

इसको तो करनी ही थी मनमानी,

और उसी क्षण उसको अपना बनाने  की हमने भी ठानी।

बड़ी पथरीली होती है  चाहत की डगर,

मझधार की तरफ धकेलती है हर एक लहर।

इश्क़ मानो मीठी सी एक सजा है,

इश्क़ में हर चोट का अपना मजा है ।

फिर हर रौशनी चांदनी की मानिंद लगती,

हर दिन रात का इंतजार करती।

कुछ बात तो थी मेरी चाहत में  भी आंखिर,

उस चाँद को भी मेरी आदत सी हो गयी।

आंखिर में उस चाँद को भी,

मुझसे मुहब्बत सी हो गयी……।

                                            क्रमशः(to be continued)...
\
needs a better title ..please suggest !!!




Saturday, June 8, 2013

मौला रे

मौला रे,

तन्हा सा कर दे मुझे।

दे दे तू मेरा जहाँ,

कोई और न हो वहां।

ना प्यार के बंधन हों,

ना नफरत भरे मन हों।

सुकून हो सन्नाटों का,

ठहरा सा हो मंजर जहां।

में खुद ही खुद से मिलूं,

खुद की भी  थोड़ी सुनूं।।

रास  आये न अब मुझे,

ये शोर करता जहाँ।।।

मौला रे।।।तनहा सा कर दे मुझे।।।।


Friday, May 24, 2013

कुछ कमी सी है

कुछ अधुरा सा,

कुछ कमी सी है।।

यूँ तो रात वही, चाँद वही, तारे वही,

फिर न जाने क्यूँ  ये छटपटाहट,

कुछ धुंधला सा,

कुछ दोराहे  से।

कुछ अपने से,

कुछ पराये  से।।

हवा वही, फिजा वही, वही नज़ारे हैं।

हर सांस में उथल पुथल,

हर धड़कन में हलचल।

धमनियों  में रक्त के ज्वार भाटे,

मस्तिष्क में पहरे सन्नाटे।।

सब सही पर कुछ कमी सी है।।।।।।।


Monday, May 6, 2013

चलता रहूँ

दो कदम ही चला था अभी,

रास्ते पथरीले हो गए।।

कटीले और उबड़ खाबड़,

सोचा तो था कि,

रास्ते मैदानी होंगे, सीधे और सपाट,

हवाएं भी सांथ देंगी।।

पर ये तो ख्वाब था,

ख्वाबों का भी  क्या दोष,

ये न होते तो,

आरम्भ ही न होता।।

हकीकत का अंदाजा न होता।।

पर अब तो चलना है हकीक़त में,

बादलों को ताकने से क्या होगा,

वो बरसेंगे जब बरसना होगा।।

सुना है सदियाँ  बीत जाती हैं,

पर्वतो को मिटने मैं, मैदान बनने मैं ..

ज़िन्दगी सदियों का तो  इंतजार नहीं कर सकती।।

मुझे ही चलना होगा,हर कदम हो होसलों भरा,

हर पतन से हो जाऊं  खड़ा।।

चलता रहूँ बस चलता रहूँ ........



Tuesday, April 16, 2013

वक़्त

वक़्त,

सृजन से काल तक।

निरंतर चलता हुआ,

न रुके कभी न थमे  कभी,

ज़िन्दगी को रफ़्तार देता हुआ।।

 यही जख्म दे यही मलहम  बने,

यही तन्हा  करे  यही हमदम बने।।

आज इसका तो कल उसका,

आज बुरा तो  कल भला।।

वक़्त वक़्त  की ही बात है कि,

वक़्त   नहीं लगता वक़्त बदलने में।।

बेवक्त बदल जाता है,

ये वक़्त।।।


Wednesday, March 20, 2013

मेरी दुनिया

उसका वो मुस्कुरा कर नजरों को झुका  लेना,

जैसे कोई नयी कली कुम्हलाई हो।।।

उसका दुपट्टे को गिराकर फिर उठा लेना,

मानो चली कोई मद्धम पुरवाई हो।।

वो चले  तो उसकी कमर का वो बल खाना,

जैसे  मौसम  ने ले ली अंगड़ाई हो।।

वो उसका खिल खिला  के हंस पड़ना बात बात पे,

मानो रिमझिम फुहारों संग धूप खिल आई हो।।।

इठलाती एसे जैसे फूलो से,

चुरा पराग कोई तितली इठलाई हो।।

मानो उसकी  शोखियों से रंग चुराकर,

खुदा ने साँझ की लालिमा बनाई हो।।

हर रंग हर नूर जैसे खुदा  ने बक्शा हो उसे,

मेरी तो मनो  उसमें  ही दुनिया समायी हो।।

Monday, February 25, 2013

इंतजार

आज  गलियों  में फिर  पानी भरा है ,

आज फिर से आसमां रोया बहुत  है।।

 बड़ी लम्बी होतीं हैं मुहब्बत में रातें,

कि हमने भी रातों में तकियों को भिगोया बहुत है।।

उसकी मुहब्बत, उसकी बेरुखी से ज्यादा दर्द दे गयी,

कि  वो मेरे क़रीब भी रहा बहुत  है।।

तक़लीफ़ देने लगतीं हैं धड्कनें  भी जब टूटते हैं ख्वाब,

कि  हमने भी ख्वाबों को संजोया बहुत है।।

अब तो हरपल  मुस्कुराते हैं हम भी,

कि  हमने भी अब तक खोया बहुत है।।

इंतजार है मौत का कि आके बचा ले जिंदगी की इन उलझनों से,

कि अब हमने भी जिंदगी को जी लिया बहुत है।।।।।।।




Wednesday, January 16, 2013

kuch bheega bheega sa tha mausam (कुछ भीगा भीगा सा था मौसम)

कुछ भीगा भीगा सा था मौसम,

कुछ सर्द हवाएं भी थी नम।।

लहराई शाखें  पेड़ों की संग हवा के,

रफ़्तार से करने लगी बातें हवाएं।।

पत्तों पे अटकी बूदों को छिटकते हुए,

निकली सर्द हवाएं गालों  को छुते हुए।।

 बूदें कुछ इस तरह पड़ी गालों  पे,

इक सिरहन सी पैदा कर गयी बदन में।।

थम गये थे मेघ दिन भर बरस कर,

थक गए थे मेघ दिन भर बरस कर।।

था क्षितिज में सूर्य भी,

साँझ का स्वागत करता हुआ।।

झांक रही थी कुछ किरणें,

बादलों  में बने इक सुराख़ से,

आकाश को संतरी करते हुए।।

 न जाने किस तरह का था य योग,

था मिलन या फिर था वियोग।।

हर रस भरा था,

कुछ अधुरा कुछ भरा था।।

हलकी  ख़ुशी थी हल्का था गम,

कुछ भीगा भीगा था मौसम,

कुछ सर्द भावाएं भी थी नम।।।