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Wednesday, March 20, 2013

मेरी दुनिया

उसका वो मुस्कुरा कर नजरों को झुका  लेना,

जैसे कोई नयी कली कुम्हलाई हो।।।

उसका दुपट्टे को गिराकर फिर उठा लेना,

मानो चली कोई मद्धम पुरवाई हो।।

वो चले  तो उसकी कमर का वो बल खाना,

जैसे  मौसम  ने ले ली अंगड़ाई हो।।

वो उसका खिल खिला  के हंस पड़ना बात बात पे,

मानो रिमझिम फुहारों संग धूप खिल आई हो।।।

इठलाती एसे जैसे फूलो से,

चुरा पराग कोई तितली इठलाई हो।।

मानो उसकी  शोखियों से रंग चुराकर,

खुदा ने साँझ की लालिमा बनाई हो।।

हर रंग हर नूर जैसे खुदा  ने बक्शा हो उसे,

मेरी तो मनो  उसमें  ही दुनिया समायी हो।।

8 comments:

  1. वाह...उसका बल खाना...उसका दुप्पटा गिराना...क्या क्या याद दिला दिया।

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  2. बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
    --
    आपकी पोस्टो को आज के चर्चा मंच पर भी लिंक किया गया है!
    सूचनार्थ...सादर!
    http://charchamanch.blogspot.in/2013/03/1190.html

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  3. बेह्तरीन अभिव्यक्ति .शुभकामनायें.

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