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Friday, May 24, 2013

कुछ कमी सी है

कुछ अधुरा सा,

कुछ कमी सी है।।

यूँ तो रात वही, चाँद वही, तारे वही,

फिर न जाने क्यूँ  ये छटपटाहट,

कुछ धुंधला सा,

कुछ दोराहे  से।

कुछ अपने से,

कुछ पराये  से।।

हवा वही, फिजा वही, वही नज़ारे हैं।

हर सांस में उथल पुथल,

हर धड़कन में हलचल।

धमनियों  में रक्त के ज्वार भाटे,

मस्तिष्क में पहरे सन्नाटे।।

सब सही पर कुछ कमी सी है।।।।।।।


Monday, May 6, 2013

चलता रहूँ

दो कदम ही चला था अभी,

रास्ते पथरीले हो गए।।

कटीले और उबड़ खाबड़,

सोचा तो था कि,

रास्ते मैदानी होंगे, सीधे और सपाट,

हवाएं भी सांथ देंगी।।

पर ये तो ख्वाब था,

ख्वाबों का भी  क्या दोष,

ये न होते तो,

आरम्भ ही न होता।।

हकीकत का अंदाजा न होता।।

पर अब तो चलना है हकीक़त में,

बादलों को ताकने से क्या होगा,

वो बरसेंगे जब बरसना होगा।।

सुना है सदियाँ  बीत जाती हैं,

पर्वतो को मिटने मैं, मैदान बनने मैं ..

ज़िन्दगी सदियों का तो  इंतजार नहीं कर सकती।।

मुझे ही चलना होगा,हर कदम हो होसलों भरा,

हर पतन से हो जाऊं  खड़ा।।

चलता रहूँ बस चलता रहूँ ........