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Monday, May 6, 2013

चलता रहूँ

दो कदम ही चला था अभी,

रास्ते पथरीले हो गए।।

कटीले और उबड़ खाबड़,

सोचा तो था कि,

रास्ते मैदानी होंगे, सीधे और सपाट,

हवाएं भी सांथ देंगी।।

पर ये तो ख्वाब था,

ख्वाबों का भी  क्या दोष,

ये न होते तो,

आरम्भ ही न होता।।

हकीकत का अंदाजा न होता।।

पर अब तो चलना है हकीक़त में,

बादलों को ताकने से क्या होगा,

वो बरसेंगे जब बरसना होगा।।

सुना है सदियाँ  बीत जाती हैं,

पर्वतो को मिटने मैं, मैदान बनने मैं ..

ज़िन्दगी सदियों का तो  इंतजार नहीं कर सकती।।

मुझे ही चलना होगा,हर कदम हो होसलों भरा,

हर पतन से हो जाऊं  खड़ा।।

चलता रहूँ बस चलता रहूँ ........



4 comments:

  1. मुझे आप को सुचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि
    आप की ये रचना 10-05-2013 यानी आने वाले शुकरवार की नई पुरानी हलचल
    पर लिंक की जा रही है। सूचनार्थ।
    आप भी इस हलचल में शामिल होकर इस की शोभा बढ़ाना।

    मिलते हैं फिर शुकरवार को आप की इस रचना के साथ।

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  2. चलना ही जिंदगी है रुकना मौत है ,चलते रहे मंजिल मिल जाएगी

    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post'वनफूल'
    latest postअनुभूति : क्षणिकाएं
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