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Friday, May 24, 2013

कुछ कमी सी है

कुछ अधुरा सा,

कुछ कमी सी है।।

यूँ तो रात वही, चाँद वही, तारे वही,

फिर न जाने क्यूँ  ये छटपटाहट,

कुछ धुंधला सा,

कुछ दोराहे  से।

कुछ अपने से,

कुछ पराये  से।।

हवा वही, फिजा वही, वही नज़ारे हैं।

हर सांस में उथल पुथल,

हर धड़कन में हलचल।

धमनियों  में रक्त के ज्वार भाटे,

मस्तिष्क में पहरे सन्नाटे।।

सब सही पर कुछ कमी सी है।।।।।।।


4 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज शनिवार (25-05-2013) छडो जी, सानु की... वडे लोकां दियां वडी गल्लां....मुख्‍़तसर सी बात है..... में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. सुन्दर कविता... दिल को छू गयी...

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