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Saturday, June 8, 2013

मौला रे

मौला रे,

तन्हा सा कर दे मुझे।

दे दे तू मेरा जहाँ,

कोई और न हो वहां।

ना प्यार के बंधन हों,

ना नफरत भरे मन हों।

सुकून हो सन्नाटों का,

ठहरा सा हो मंजर जहां।

में खुद ही खुद से मिलूं,

खुद की भी  थोड़ी सुनूं।।

रास  आये न अब मुझे,

ये शोर करता जहाँ।।।

मौला रे।।।तनहा सा कर दे मुझे।।।।


9 comments:

  1. बहुत सुन्दर प्रस्तुति...!
    आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि आपकी इस प्रविष्टि की चर्चा आज रविवार (09-06-2013) को तो क्या हुआ : चर्चा मंच 1270 में "मयंक का कोना" पर भी है!
    सादर...!
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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  2. भावपूर्ण प्रस्तुति।

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  3. Waah... Kya baat hai...Bahoot khoob... :)

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  4. कविता अच्छी है ,इतनी भी क्या बेरुखी दुनियां से ?

    अनुशरण कर मेरे ब्लॉग को अनुभव करे मेरी अनुभूति को
    latest post: प्रेम- पहेली
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