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Wednesday, July 24, 2013

चाहत...

देखा जब चाँद को फलक पे ,

तो उसको पाने की चाहत सी जाग गयी।

अक्सर मुलाकात होती थी उससे रातों को,

इस तरह हमारी रातों की नींद भाग गयी।

किसी ने पागल कहा किसी ने कहा दीवाना,

आंखिर हो ही गयी थी मुहाब्बत हमने भी माना।

चाहने से ही हांसिल नहीं होता कुछ ,

तब हमने भी जाना।

जब देखा कि उस चाँद का तो था हर कोई दीवाना,

पर दिल तो दिल है,

इसको तो करनी ही थी मनमानी,

और उसी क्षण उसको अपना बनाने  की हमने भी ठानी।

बड़ी पथरीली होती है  चाहत की डगर,

मझधार की तरफ धकेलती है हर एक लहर।

इश्क़ मानो मीठी सी एक सजा है,

इश्क़ में हर चोट का अपना मजा है ।

फिर हर रौशनी चांदनी की मानिंद लगती,

हर दिन रात का इंतजार करती।

कुछ बात तो थी मेरी चाहत में  भी आंखिर,

उस चाँद को भी मेरी आदत सी हो गयी।

आंखिर में उस चाँद को भी,

मुझसे मुहब्बत सी हो गयी……।

                                            क्रमशः(to be continued)...
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needs a better title ..please suggest !!!




4 comments:

  1. मंगलवार 24/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    आप भी एक नज़र देखें
    धन्यवाद .... आभार ....

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