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Thursday, August 8, 2013

चाहत 2

वो चाहत थी मेरी ,

मेरी इबादत थी।

मगर उसको तो तारों के बीच में रहने की आदत थी।

ये शरारत थी उसकी,

या उसकी फितरत थी।

होगा उसके दिल में मेरे लिए प्यार,


मगर तारों की भी हसरत थी।

ये जो तारों के लिए थी चाहत,

वो मुझे न थी गवारा,

जब मेरा ही बन गया था तो,

उसपे हक था सिर्फ मेरा।।

जला देते खुद को आंखिर उसकी खातिर,

हम भी बन जाते सितारा।

लाख किये जतन,लाख समझाया,

न माना वो।

तब समझ आया उसे ,

जब  वो ही न रहा मेरा।

आज फिर वो चाँद फलक पे है,

पर आज फांसले हैं दरम्यान।

आज फिर हम अकेले हैं,

और उसका है सारा जहाँ।।




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